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मज़ामीर (यानी म्यूज़िक) के साथ क़व्वाली गाना सुनना

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*🥀 मज़ामीर (यानी म्यूज़िक) के साथ क़व्वाली गाना सुनना 🥀*



*🔊 पोस्ट 3*

✏️ फवाइदुल फवाद में है हज़रत महबूब ए इलाही की ख़िदमत में एक शख़्स आया और बताया कि फ़लां जगह आपके मुरीदों ने महफ़िल की है और वहां मज़ामीर (यानी म्यूज़िक) भी थे
हज़रत महबूब ए इलाही ने इस बात को पसंद नहीं फ़रमाया और फ़रमाया के मेंनें मना किया है के मज़ामीर (यानी म्यूज़िक) बाजे हराम चीज़ें वहां नहीं होना चाहिए
उन लोगों ने जो कुछ किया अच्छा नहीं किया इस बारे में काफी ज़िक्र फरमाते रहे उसके बाद हज़रत ने फ़रमाया के
अगर कोई किसी मक़ाम से गिरे तो शराअ में गिरेगा और अगर कोई शराअ से गिरा तो कहां गिरेगा,

*📚 फवाइदुल फवाद जिल्द 3. मजलिस 5 मतबूआ उर्दू एकेडमी देहली सफा 512, तर्जमा ख़्वाजा हसन निज़ामी)*

❤‍🩹 मुसलमानों ज़रा सोचो ये हज़रत ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया देहेलवी रहमातुल्लाहि तआला अलैह का फतवा है जो तुमने ऊपर पढ़ा इन अक़वाल के होते हुए कोई ये कह सकता है के ख़ानदान ए चिश्तीयाह में मज़ामीर (यानी म्यूज़िक) के साथ क़व्वाली गाना सुनना जाइज़ है
हां ये बात वो लोग कहेंगे जो न चिश्ती हैं न क़ादरी उन्हें तो मज़ेदारियां और लुत्फ अन्दोज़ियां चाहिए और अब जबके सारे के सारे क़व्वाल बे नमाज़ी और फासिक़ व फाजिर हैं यहां तक के बाअज़ शराबी तक सुनने में आये हैं यहां तक के औरतें और अमरद लड़के भी चल पड़े हैं ऐसे माहौल में इन क़व्वालियों को वोही जाइज़ कहेगा जिसको इस्लाम और क़ुरआन दीन व ईमान से कोई मुहब्बत न हो और हराम कारी बेहयाई बदकारी उसके रग व पै में सरायत कर ग‌ई हो और क़ुरआन व हदीस शरीफ़ के फ़रामीन की उसे कोई परवाह न हो क्या इसी का नाम इस्लाम पसंदी है के मुसलमान औरतों को लाखों के मजमे में लाकर उनके गाने बजाने कराए जाएं फिर उन तमाशों का नाम उर्स ए बुज़ुर्गान ए दीन रखा जाए,

❣️काफ़िरों के सामने मुसलमानों और मज़हब ए इस्लाम को ज़लील व बदनाम किया जाय
(माअज़ अल्लाहि रब्बिल आलमीन)
कुछ लोग कहते हैं के क़व्वाली अहल के लिए जाइज़ और न‌ अहल के लिए न जाइज़ है, ऐसा कहने वालों से हम पूछते हैं के आज कल जो क़व्वालियों की मजालिस में जो लाखों लाख के मजमे होते हैं क्या ये सब अहलुल्लाह और असहाब ए इस्तग़राक़ हैं जिन्हें दुनियां व मताअ ए दुनियां का क़तअन होश नहीं जिन्हें याद ए ख़ुदा ज़िक्र ए इलाही से एक आन की फुर्सत नहीं

❤‍🩹 ख़र्राटे की नींदों और गप्पों शप्पों में नमाज़ों को गंवा देने वाले रात दिन नंगी (सैक्सी) फिल्मों और गंदे गानों में मस्त रहने वाले
मां बाप की नाफ़रमानी करने और उनको सताने वाले चोर डकैत झूटे फ़रेबी ग्रह काट वग़ैराह क्या सब के सब थोड़ी देर के लिए क़व्वालियों की मजलिस में शरीक होकर अल्लाह वाले हो जाते हैं
और ख़ुदा की याद में महव हो जाते हैं या पीर साहब ने अहल का बहाना तलाश करके अपनी मौज मस्तीयों का सामान कर रखा है के पीरी भी हाथ से न जाए और दुनियां की मौज मस्तीयों में भी कोई कमी न आए,

📝 याद रखो क़ब्र की अंधेरी कोठरी में कोई हीला व बहाना न चलेगा, ब‌अज़ लोगों को ये कहते सुना गया है के मज़ामीर
(यानी म्यूज़िक) के साथ क़व्वाली नाजाइज़ होती तो दरगाहों और ख़ानक़ाहों में क्यों होती, काश ये लोग जानते के रसूलल्लाह सल्लललाहू तआला अलैहि वसल्लम की आहादीस और बुज़ुर्गान ए दीन के मुक़ाबले में आज कल के फ़ुस्साक़ दाढ़ी मुंडाने वाले नमाज़ों को क़सदन छोड़ने वाले ब‌अज़ ख़ानक़ाहीयों का अमल पेश करना दीन से दूरी और सख्त नादानी है, 

💓 जो आहादीस हमनें ऊपर 
लिखीं और बुज़ुर्गान ए दीन के अक़वाल नक़ल किये उनके मुक़ाबिल न किसी का क़ौल म‌अतबर होगा न अमल,
आज कल ख़ानक़ाहों में किसी काम का होना उसके जाइज़ होने की शर‌ई दलील नहीं,

*अगली पोस्ट.....*



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