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मज़ामीर (यानी म्यूज़िक) के साथ क़व्वाली गाना सुनना

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*🥀 मज़ामीर (यानी म्यूज़िक) के साथ क़व्वाली गाना सुनना 🥀*



*🔊 पोस्ट 1*

✏️ आज कल बुज़ुर्गान ए दीन के मज़ारात पर एरास (उर्स) का नाम लेकर खूब मौज मस्तीयां हो रही हैं और अपनी रंग रंगीलीयों बाजों तमाशों औरतों की छेड़छाड़ के मज़े उठाने के लिए अल्लाह वालों के मज़ारों को इस्तेमाल किया जा रहा है और ऐसे लोगों को न खुदा का खौफ है न मौत की फ़िक्र और न जहन्नम का डर,
अगर ये लोग मौज मस्तीयां ये ढोल बाजे मज़ामीर (Music) के साथ क़व्वालियां मज़ारात से अलग करते और उर्स का नाम न लेते तो कम से कम इस्लाम और इस्लाम वाले बुजुर्ग बदनाम न होते,

💖 अब जब यह बेवक़ूफ़ लोग मौज़ मस्ती करने में लगे हैं तो यही लोग गुनाहगार हुए, आज कुफ्फार और मुशरेकीन यह कहने लगे हैं के इस्लाम भी दूसरे मज़ाहिब की तरह नाच गानों तमाशों बाजों और बे पर्दा औरतों को इस्टेजों पर लाकर बेहयाई का मुज़ाहिरा करने वाला मज़हब है लिहाज़ा अहले कुफ्र के
इस्लाम क़ुबूल करने की जो रफ्तार थी उसमें बहुत बड़ी कमी आ गई है,
*मज़हबे इस्लाम में बतौर ए लहव व ल‌इब ढोल बाजे और मज़ामीर (Music) हमेशा से हराम रहे हैं,*

*📚 बुखारी शरीफ की हदीस शरीफ़ है*

🌹रसूलल्लाह सल्लललाहू तआला अलैही व सल्लम ने इरशाद फ़रमाया ज़रूर मेरी उम्मत में ऐसे लोग होने वाले हैं जो ज़िना रेशमी कपड़ों शराब और बाजों ताशों को हलाल ठहराएंगे

*📚 सही बुखारी जिल्द 2 किताबुल अश‌रबा सफा 837*

❣️दूसरी हदीस शरीफ मैं हुज़ूर नबी ए करीम अलैहिस्सलातु व तस्लीम ने क़ियामत की निशानियां बयान करते हुए इरशाद फ़रमाया क़ियामत के क़रीब नाचनें गानें वालियों और बाजे ताशों की कसरत हो जायेगी

*📚तिरमिज़ी शरीफ़*
*📚मिश्कात शरीफ़ बाब अशरातुस्सअह सफा 470*

💖 फतावा आलम गीरी में है
सिमाअ, क़व्वाली, रक़्स (नाच), जो आज कल के नाम निहाद सूफीयों में राइज है ये हराम है इसमें शिरकत जाइज़ नहीं

*📚 फतावा आलम गीरी जिल्द 5 किताबुल कराहियह सफा 352*

💓 मुजद्दिद ए आज़म सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान फाज़िल ए बरेलवी रज़ीअल्लाहू त‌आला अन्ह ने अपनी किताबों में क‌ई जगह मज़ामीर (music) के साथ क़व्वाली गाना सुनना हराम लिखा है देखिए फतावा रज़वीयाह और मलफूज़ात ए आला हज़रत,
कुछ लोग कहते हैं क़व्वाली माअ मज़ामीर (यानी म्यूज़िक)
के साथ चिश्तीयह सिलसिले में राइज और जाइज़ हैं,
ये बुज़ुर्गान ए दीन चिश्तीयह पर उनका सरीह बोहतान है
उन बुजुर्गों ने भी मज़ामीर 
(यानी म्यूज़िक) के साथ क़व्वाली सुनने को हराम फ़रमाया है
सय्यदना महबूब ए इलाही हज़रत
निज़ाम उद्दीन औलिया देहेलवी रहमातुल्लाहि तआला अलैह ने अपने ख़ास ख़लीफा़ 
सय्यदना फ़ख़रुद्दीन ज़रदारी रहमातुल्लाहि तआला अलैह से मस‌अला ए सिमाअ के मुताल्लिक़ एक रिसाला लिखवाया जिसका नाम

*📚 क़शफुल क़नाअ अन उसूलिस्सिमाअ है*

👉 इस मैं साफ़ लिख़ा है 
हमारे बुजुर्गों का सिमाअ इस मज़ामीर (Music) के बोहतान से बरी है उनका सिमाअ तो ये है के सिर्फ क़व्वाल की आवाज़ उन अश‌आर के साथ हो जो कमाल ए सिन‌अत ए इलाही की खबर देते हैं,

*अगली पोस्ट.....*



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